रविवार, 31 मई 2020
भारत के ज्वलंत मुद्दों का हल भी हमे ही खोजना होगा-व्यास
https://www.facebook.com/100002807116273/posts/2426894957414051/?sfnsn=wiwspmo&extid=dn7CLNSzw4eKBuFk
शुक्रवार, 29 मई 2020
सोशियल मीडिया के लिए आचार सहिंता बनाने का वक्त आ गया है-व्यास
*सोसियल मिडिया के लिए आचार सहित बनाकर लागु कराने का वक्त आ गया-व्यास*
आज सोसियल मिडिया ऑपरेटर का नाम पत्ता पहचान स्पष्ट होनी ही चाहिए, ताकि मिडिया का नफ़रत फैलाने और राजनैतिक स्वार्थो के लिए दूरूपयोग न हो सके, आज राजनैतिक पार्टी और उनके आई टी सलाहकारों ने बोगस आई डी का इस्तेमाल कर भी उन्माद फैलाने के काम को अंजाम दिया है, नामी गरामी लोगों तक की आई डी का दुरूपयोग हो रहा है पुलिस राजनैतिक प्रभाव में होने से आरोपियों के विरुद्ध भी प्रभावी कार्यवाही न कर लीपापोती ही कराती है पुलिस दखल अंदाजी योग्य मामलों में पुलिस का दखल न देना समय पर कार्यवाही न करना, और समय पर अदालतों में मामले पेश न करने से भी सोसियल मिडिया का आपराधिक कार्य में इस्तेमाल हो रहा है कई बार अच्छे और प्रभावी कार्य करने वाले सोसियल मिडिया को प्रताड़ित और जलिज भी किया जाता है, सत्ता और प्रशासन द्वारा !सत्ता और प्रशासन के खिलाफ जन हित की अवहेला के मामले उजागर करने के प्लेटफॉर्म भी जरुरी है ताकि सत्ता और प्रशासन की जवाबदेही निश्चित की जा सके, जनता में जागरूकता पैदा करने जन समस्या समाधान के लिए भी ऐसे मंचो की आवश्यकता है,
आज सोसियल मिडीया को अपराधी गिरोह वाईट कालर अपराधियों से मुक्ति का वक्त आ गया है, आईये और सोसियल मिडिया आचार सहित के लिए पहल करे ताकि पेड़ मिडिया बनने से बचा सके,
*अपने शुभचिंतकों को फॉरवर्ड करें।*
आभार - GyanApp
https://gyan.page.link/?link=https://gyanapp.in/hindi/blogs/42867/share/?ref=wa&apn=com.gyanapp
न्याय प्राप्त करना व्यक्ति का नैसर्गिक अधिकार है-व्यास
मनुष्य का न्याय प्राप्त करना नैसर्गिक, संवेधानिक और कानूनी अधिकार है, प्राचीन काल में भी राजा को न्याय का देवता माना जाता था, शास्त्रों में भी उल्लेख है की आतताई अय्यास राजा को सत्ता से हटाने को न्याय सम्मत कृत्य ही मन गया था, आचार्य शुक्राचार्य, चाण्यक्य, गौतम ऋषि, महर्षि वाल्मीकि वेद व्यास ने न्याय सम्मत आचरण व्यवहार की की राजा से उम्मीद की है, न्याय होना ही नहीं चाहिए बक्ली दिखाना भी चाहिए की न्याय हो रहा है !अलाउद्दीन खिलजी के समय भी खाद्य वस्तुओ में मिलावट को मृत्यु दंड के योग्य अपराध मन जाता था, टेक्स भी राज्य को न्याय सम्मत ही वसूल करना चाहिए, राजा भोज की न्याय व्यवस्था, जहांगीर का न्याय इतिहास, महाराणा कुम्भा की न्याय व्यवस्था चर्चित थी, आजाद भारत में सामान्य परिस्थितियों में न्याय व्यवस्था संतोषजनक रही है परन्तु आपातकाल में उच्चतम न्यायलय तक देश में नागरिक अधिकारों की रक्षा ही कर पाई, भारत में आपातकाल अन्याय का काल खण्ड ही कहा जायेगा क्यों की आपातकाल में सत्ता का खुला दुरूपयोग मनमाने पन का काल ही कहा जायेगा, आज का काल खंड जिसमे न्यायपालिका की भूमिका संतोषजनक नहीं कही जाएगी क्यों की नवरीको के मुलभुत अधिकारों की रक्षा इस दोर में होनी चाहिए थी वैसी नहीं हो रही है, प्रवासी श्रमिक गरीब और वंचित वर्ग को आवास, स्वास्थ्य, आजीविका से वंचित होना पड़ रहा है, परतु न्यायपालिका सरकारों से सार्थक जावाब तलब कर वंचित को न्याय नहीं दिला पा रही है, नागरिक अधिकारों की रक्षा का सविधान में दायित्व न्यायपालिका का ही है उसे भी जनता की अदालत में जवाबदेह ठहराना होगा,
कोई भी समाज यदि न्याय से वंचित होगा तो वहॉ अराजकता ही पैदा होगी ,
कोई भी समाज यदि न्याय से वंचित होगा तो वहॉ अराजकता ही पैदा होगी ,
बुधवार, 5 मार्च 2014
आगामी लोकसभा चुनाव देश की दशा एवं दिशा तय करेंगे - व्यास
देशभर में 12 अप्रेल 2014 से 12 मई 2014 तक लोकसभा के एवं तीन राज्यों के विधानसभा के चुनाव होना निश्चित हुआ है। देश का 81 करोड़ से ज्यादा मतदाता आगामी चुनाव में मतदान करेगा। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि देश का 10 करोड़ से ज्यादा मतदाता वो है जो पहली बार मतदान करेगा। उसके मन में उठ रहे ज्यार भाटे को समझना प्रत्येक राजनीतिक दल एवं नेता के लिए चुनौतिपूर्ण कार्य है। चैखंभे राज की परिकल्पना रखने वाले डाॅ. राममनोहर लोहिया जी ने आजाद भारत में चैखंभा राज की मजबूती की कल्पना की थी। भारतीय लोकतंत्र में विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका एवं स्वतंत्र निर्भिक पत्रकारिता एवं प्रभावी जनसमूह की भी कल्पना की गई है। परन्तु आज विधायिका द्वारा बनाये गये कानून या तो बेअसर हो रहे है या लागू करने वाली एंजेसिया कानूनों को लागू करते समय अपनी इच्छा व इनिच्छा को ध्यान में रखके फैसले करती है। जिसके कारण जिन उद्देश्यों से कानून बनाये गये वो कानून उन उद्देश्यों को प्राप्ति नही कर पाता जिसके लिए उन्हे बनाया गया। आज भी कई लोकहित के कानून ठीक तरह से लागू नहीं हो पा रहे है। या जिन एंजेसियों को कानून लागू करने की जिम्मेदारी दी गई है वह सुविधा एवं असुविधा के आधार पर या व्यक्तिगत मान्यताओं से प्रभावी होकर कानूनों को निष्प्रभावी बना रहे है। कार्यपालिका या सरकार केवल वोट बैंक को कैसे लामबंद किया जा सकता है इसकों ध्यान में रखकर कानूनों का निर्माण एवं फैसले किये जा रहे है। सस्ती लोकप्रियता के चक्कर में सरकारे वो निर्णय भी कर रही है जो विकास के बजाय विनाश के बीज तैयार कर रहे है। न्यायपालिका लोगों को न्याय नहीं दे रही है केवल निर्णय दे रही है। वो प्रत्येक निर्णय जरूरी नहीं है कि न्यायपूर्ण हो।
आज की आवश्यकता यह है कि निर्णय न्यायपूर्ण हो और कानूनों की सही व्याख्या करते हो। स्वतंत्र एवं निष्पक्ष पत्रकारिता की उम्मीद आजादी के पहले की गई थी। परन्तु आज हिन्दुस्तान का मीडिया 81 हजार करोड़ का एक व्यापार बन कर रह गया है जिसमें हर निवेशक केवल आर्थिक लाभ ही ढ़ूंढता है। पत्रकारिता से संवेदनशीलता समाप्त होती जा रही है और नकारात्मक एवं पीत पत्रकारिता प्रभावी होती जा रही है। आज पेड न्यूज का व्यापार भी तेजी से फलता फूलता जा रहा है। भारतीय लोकतंत्र में पत्रकारिता काॅर्पोरेट इण्डिया का पेरोकार होती जा रहा है। जबकि उसे असली भारत के प्रति जवाबदेह, पारदर्शी होना चाहिए। आज आवश्यकता है समाज के शिक्षित और प्रशिक्षित जवाबदेह जनसमूह राजनीति, समाज व्यवस्था एवं सामाजिक ताने-बाने पर अपना नियंत्रण स्थापित करें अन्यथा देश में क्रांति हो या ना हो अराजकता तो हो ही सकती है।
जब तक समाज में नीति, नेता व नियत ठीक नहीं होगी तब तक आम आदमी के जीवन में कोई सूर्योदय नहीं हो पायेगा। आगामी चुनाव निश्चित रूप से नीति एवं नेता की अग्नि परीक्षा होगी कि वह जनहित में काम करते है या स्वहित में काम करते है।
गुरुवार, 16 जनवरी 2014
विधि: आम आदमी के हितों की सुरक्षा केवल जन आन्दोलन से ही ...
विधि: आम आदमी के हितों की सुरक्षा केवल जन आन्दोलन से ही ...: 15 अगस्त 1947 को भारत अंग्रेजी शासन की दासता से मुक्त हुआ था। आजादी के आन्दोलन से पूर्व स्वतंत्रता सैनानियों का एक मात्र लक्ष्य था कि भारत ...
रविवार, 12 जनवरी 2014
विधि: आम आदमी के हितों की सुरक्षा केवल जन आन्दोलन से ही ...
विधि: आम आदमी के हितों की सुरक्षा केवल जन आन्दोलन से ही ...: 15 अगस्त 1947 को भारत अंग्रेजी शासन की दासता से मुक्त हुआ था। आजादी के आन्दोलन से पूर्व स्वतंत्रता सैनानियों का एक मात्र लक्ष्य था कि भारत ...
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