शुक्रवार, 29 मई 2020

न्याय प्राप्त करना व्यक्ति का नैसर्गिक अधिकार है-व्यास

मनुष्य का न्याय प्राप्त करना नैसर्गिक, संवेधानिक और कानूनी अधिकार है, प्राचीन काल में भी राजा को न्याय का देवता माना जाता था, शास्त्रों में भी उल्लेख है की आतताई अय्यास राजा को सत्ता से हटाने को न्याय सम्मत कृत्य ही मन गया था, आचार्य शुक्राचार्य, चाण्यक्य, गौतम ऋषि, महर्षि वाल्मीकि वेद व्यास ने न्याय सम्मत आचरण व्यवहार की की राजा से उम्मीद की है, न्याय होना ही नहीं चाहिए बक्ली दिखाना भी चाहिए की न्याय हो रहा है !अलाउद्दीन खिलजी के समय भी खाद्य वस्तुओ में मिलावट को मृत्यु दंड के योग्य अपराध मन जाता था, टेक्स भी राज्य को न्याय सम्मत ही वसूल करना चाहिए, राजा भोज की न्याय व्यवस्था, जहांगीर का न्याय इतिहास, महाराणा कुम्भा की न्याय व्यवस्था चर्चित थी, आजाद भारत में सामान्य परिस्थितियों में न्याय व्यवस्था संतोषजनक रही है परन्तु आपातकाल में उच्चतम न्यायलय तक देश में नागरिक अधिकारों की रक्षा ही कर पाई, भारत में आपातकाल अन्याय का काल खण्ड ही कहा जायेगा क्यों की आपातकाल में सत्ता का खुला दुरूपयोग मनमाने पन का काल ही कहा जायेगा, आज का काल खंड जिसमे न्यायपालिका की भूमिका संतोषजनक नहीं कही जाएगी क्यों की नवरीको के मुलभुत अधिकारों की रक्षा इस दोर में होनी चाहिए थी वैसी नहीं हो रही है, प्रवासी श्रमिक गरीब और वंचित वर्ग को आवास, स्वास्थ्य, आजीविका से वंचित होना पड़ रहा है, परतु न्यायपालिका सरकारों से सार्थक जावाब तलब कर वंचित को न्याय नहीं दिला पा रही है, नागरिक अधिकारों की रक्षा का सविधान में दायित्व न्यायपालिका का ही है उसे भी जनता की अदालत में जवाबदेह ठहराना होगा, 
कोई भी समाज यदि न्याय से वंचित होगा तो वहॉ अराजकता ही पैदा होगी ,

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