*पहला सुख निरोगी काया सुख एंटी में माया-व्यास*
1. भारतीय प्राचीन समाज व्यवस्था के अनुसार आदमी की उम्र 100 वर्ष तक की हुआ करती थी, 25 अध्ययन अध्यापन में ही समय व्यतीत करता था आदमी !ब्रह्म चारी रह कर ज्ञान विज्ञान कला संस्कृति सामाजिक व्यवहार का व्यावहारिक व्यान प्राप्त करता था, आदमी कठोर परिश्रम करता था, सवेदन शील रह कर समाज के सुख दुःख में ही अपना सुख दुःख खोजता था, स्वास्थ्य, साफ सफाई शुद्ध आहार विहार पर ध्यान देता था, प्रकृति से जुड़ा रहा कर व्यक्ति अपने को और पर्यावन को पाक साफ रखता था, पशु पक्षी, चर चराचर से निकटस्थ रिश्ते थे, व्यक्ति प्रकृति मित्र था दुश्मन नहीं, और आज मनुष्य प्रकृति पर विजय प्राप्ति का दम्भ भरता है, आवश्यकता अविष्कार की जननी है जैसे मनुष्य के जीवन में कठिनाईया आई तो उसने ही कठिनाइयों का समाधान ज्ञान विज्ञान अनुभव से खोजा ! आज समाज महामारी से बुरी तरह पीड़ित है, समस्या का रास्ता भी इन्ही तख़लीफ़ो में से ही निकल आएगा, स्वास्थ्य के मोर्चे पर सम्पूर्ण भूमण्डलवासी संघर्षरत है, अस्वस्थ्य नहीं का मतलब पूर्ण स्वस्थ है ये अर्थ नहीं लगा सकते है, शारीरिक मानसिक सामाजिक स्वास्थ्य भी ठीक होना जरुरी है, आज सभी मोर्चे पर मनुष्य जाती अस्वस्थ्य है, आज समाज में स्वास्थ्य शिक्षा पर सा से ज्यादा काम करने की आवश्यकता है आज ग्राम स्वास्थ्य कार्यकर्त्ता कहाँ है जिन्हे हमने ट्रेनिंग कराई थी ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन क्या कर रहा है आज उनकी ज्यादा आवश्यकता है राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन अपनी प्रभावी भूमिका निर्वाह करे,
*अपने शुभचिंतकों को फॉरवर्ड करें।*
आभार - GyanApp
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